Sunday, October 24, 2010

उम्र कैदी

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Part 1- उम्र कैदी : अपहरण, बलात्कार और हत्या के आरोप में तो सब ही जेल जाते हैं, सजा पाते है परंतू मैं ऐसे जुर्म की सजा भुगत रहा हूँ जिसका में गुनेहगार कदापित नहीं हूँ|
4 साल की उम्र से ही घर से बहार रहा, माता पिता के प्रेम से हमेशा ही वंचित रहा | किसी तरह अपने रिश्तेदारों के साथ रह कर अपनी अभी तक की ज़िन्दगी काटी, जैसे जैसे युवावस्था में कदम रखा अपने आपको सब से अलग पाया | मित्रों के खालायात सब अपने से विपरीत पाए | सब कुछ अपने ह्रदय में समाते रखा, करता भी क्या? किसी से अपने ह्रदय की बातें भी नहीं कर सकता था, सो चुप रहा |

किन्तु 18 साल की उम्र में जैसे ही कदम रखा, मानो दुनिया मेरे लिए ख़त्म हो गयी. अपने परिजन को अपने समलैंगिक होने के विषय में बताया तो उसने घर पर सब को बता दिया. अपरोक्त विषय के बारे में अपने मित्र को बताया तो उसने भी किनारा कर लिया|
पिता जी ने घर से बेदखल कर दिया |

परिवारजनों ने दी मुझे मृत्यु से बदतर, मर मर कर जीने की सजा| इससे बेहतर होता कि मुझे किसी के क़त्ल के जुर्म में उम्र कैद कि सजा हो जाती या फंसी हो जाती| घुट घुट कर जीने से तो अच्छा होता कि इक बार में ही काम तमाम हो जाता | ताकि एक नया जीवन मिलता तो उसे अपनी इच्छा से तो जी पाता |
इक परिंदे कि तरह.... खुल कर....



मुझे अनके महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने सलाह दी, अपने विचार एवेम अनुभव मेरे साथ बांटे, उन् सब के लिए में आभार प्रकट करता हूँ | कई मित्रों ने मुझे अपने और से सहयोग प्राप्त कराने का विश्वास भी दिलाया और उन् सब मित्रों एवेम सुभ्चिन्तकों के लिए मैं अपने पूर्ण ह्रदय से आभार प्रकट करता हूँ|

कोई ऐसा दिन नहीं जाता होगा जिस दिन में अपने माता पिता को याद नहीं करता हूँ, मेरा जीवन उनके बिना अधूरा है,
मित्रो, हम मानव हैं और मानव समाज में व्याप्त सभी प्रकार के गुनाव्गुनों से हम आल्पवित हैं | अन्धकार और खोर हम सभी के जीवन में कभी न कभी आ ही धमकता है| हम जिस मानव समाज में रहते है, उस समाज में हजारों गुणों के साथ-साथ कुछ एक ऐसे अवगुण या नकारात्मक व्यव्हार भी विद्यमान हैं, जो हमें आपस में इक दुसरे का दुश्मन बना देते हैं |ऐसे में मेरा केवल इतना सा अनुरोध है कि मैं नहीं चाहता कि मेरी पहचान प्रकट होने के बाद कुछ मित्र मेरे प्रति विशेष आग्रह, अनुराग, दुराग्रह या पूर्वाग्रह से प्रभावित होकर अपने विचार रखें।

1- मेरा जीवन
मैं इक अछे मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मा था, पिताजी फोज में आफर थे| पिता जी और माता जी दोनों हिंदी लिखना पड़ना जानते थे, और परिवार में ही नहीं पूरे कुटुंब में अन्य कोई साक्षर नहीं था| मेरा एक बड़ा भाई था जिसकी बाल्य काल में मृत्यु हो गयी थी| मैं अपने माता-पिता कि दूसरी जीवित संतान हूँ और अभी अपने परिवार में सबसे बड़ा हूँ| इक छोटा भाई और दो छोटी बहनें हैं मेरी|

4 वर्ष कि आयु से ही मैं अपने माता-पिता से दूर बोअर्डिंग स्कूल में पढ़ा हूँ. स्कूल से घर , घर से स्कूल, साल भर में येही मुख्या कार्य होते थे| घर पर कुछ स्थानीय दुश्मनी के कारण हमें अपना घर बार छोड़ कर जाना पड़ा और इसी बीच में मुझे अपना बोअर्डिंग स्कूल छोड़ कर अपने बुआ और फूफा जी के घर रह पड़ा|

पिता जी कि ज़मीन चीन ले गयी और फोज से भगोड़े घोषित किये गये| पंडित को दिखाया तो पंडित जी ने कहा कि आपका बड़ा लड़का मनहूस है, पहले आपके सुपुत्र को खा गया और अब आप सब को खा जायेगा| बस वो दिन और ये दिन कि पिता जी के लिए जैसे मैं मर ही गया, कभी प्यार से दुलारना तो क्या, बात करने के लिए भी मेरे कान तरस जाते थे?
पिता जी मजदूरी किया करते थे किन्तु में अपने बुआ के घर पढाई लिखी किया करता था| महीनों और साल हो जाते थे पिता जी से बात किये हुए, दिल को बहुत दुःख होता था, घंटों गुसलखाने में छुप्प कर रोया करता था|

माँ का दिल तो माँ का दिल ही होता है, सो वो कभी कभार पिता जी से छुप्प कर बात कर लिया करती थी|
घर कि माली हालत बहुत खस्ता थी, पिता जी ने स्कूल से हटा दिया, लेकिन मेरे मास्टर जी ने निवेदन किया कि लड़का बहुत होनहार है, वजीफा दिलवा देंगे, उसी साल मुझे अंग्रेजी मध्यम स्कूल में वजीफा मिल गया और पढाई चलती रही|

"ये मनहूस है, ये तुम सब को खा जाएगा", और न जाने क्या , ना-ना प्रकार कि टिप्नियाँ सुनने को मिलती थी मुझे| पिता जी और भी दूर जाते रहे|
कई बार आत्म हत्या के बारे मैं सोचा परंतू न जाने कोनसी ताकत थी, कि मुझे अपने आप पर विश्वास था. अनेक लोगों ने मेरे पिता जी को बताया कि अपने लड़के का भूत उतारो, पूजा पाठ करवायो वर्ना ये सारे वंश को खा जायेगा|

अभी भी वो टिप्पणियाँ कानों में गूंजती हैं तो रोंगटे खड़े हो जातें हैं, और आंसूं खुद बी खुद बहने लगते हैं.
बहरहाल, जीवन किसी के लिए रुकता नहीं है.............



क्रमश: जारी.........

मैं यह अवश्य चाहता हूँ कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये ! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।


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