Sunday, May 20, 2012

आखरी ख़त - Continued from Part 2

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Part 3:


"अरे कहीं मर तो नहीं गया मनहूस", आँख खुली तो यह शब्द सुनने को मिले| पिता जी और बुआ सामने खड़े थे, और साथ में इक डॉक्टर साहिब भी थे| ३ दिन से बेहोश था, आंख खोलने की हिम्मत नहीं थी, उठा कर मुझे पालकी मैं दाल कर हस्पताल ले जाया गया| कुछ दिन हस्पताल में रहा लेकिन कोई मुझे देखने नहीं आया|
इक दिन मौका लगा तो सोचा की क्यों न अपनी जीवन लीला समाप्त कर दूँ और अपने आप को इस पीड़ा से मुक्ति दिलवाऊ | इक कागज़ पर अपनी माँ के लिए आखरी ख़त लिखा और वहां से चल पड़ा, दूर... सब से दूर... अपनी माँ से जिसे मैंने बहुत समय से देखा नहीं... अपने भाई से... जिसके उपर मेरी चाय भी नहीं पदनी चाहिए... और बाकि सब के लिए जिनके लिए मेरे होने या न होने से कुछ फर्क नहीं पड़ेगा....... बस येही सोच कर की शायद अगले जनम में मेरे माँ और पिता जी मुझे भी प्यार करेगे...अपने कदम आगे बढ़ता गया....
हस्पताल से बुआ के घर पर खबर आई की मैं कहीं चला गया हूँ... पिता जी और माता जी.. जब हस्पताल पूछे तो सिस्टर ने चुपके से मेरी दी हुई चिट्ठी मेरी माँ को दे दी.....
उसमे लिखा था.....
"मेरी प्यारी माँ....
मुझे पता है की मैं इक अच्छा पुत्र नहीं हूँ. मैंने कुछ पिछले जनम में पाप किये होंगे की आपका प्यार नहीं पा सका...मैं बहुत ही गन्दा हूँ शायद तभी तुम मुझे से मिलने भी नहीं आई|
मैं बहुत ही मतलबी हूँ क्योकि मैंने अपने भाई को खा लिया... आपका नान डुबो दिया... बहुत दुःख होता है जब यह सोचता हूँ की भगवन ने मुझे इतने अछे माँ बाप दिए और मैंने उनको इतना बुरा समय दिखाया|
लेकिन में ये गर्व से कह सकता हूँ की इक भी दिन ऐसा नहीं गया जब मैंने आपको अपने दिल में न देखा हो और मरते दम तक आप मेरे दिल में रहोगे|
आपने पिता जी से जो  भी सुना, वो सब सच है...मैं इसलिए आपको दुखी  नहीं करना चाहता क्योकि मैं इक "--------" हूँ.... लेकिन मैंने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, आपके लिए शायद मेरे बारे में वो सब सुनना इक कडवा सच होगा लेकिन येही सच है... पहले  भी कई बार मैंने आपसे ये कहने की कोशिश की थी.. लेकिन डरता था क्या होगा.... लेकिन अब नहीं डरता... न ही अपने से... न ही भगवन से और न ही मौत से...
मेरा ऐसा होना मेरे हाथ में नहीं है.. मुझे ऐसा भगवन ने बनाया है..  माँ... मुझे माफ़ कर देना.. मेरे पास और कोई चारा नहीं है..
मुझे पता है आप बहुत दर्द में होगी, लेकिन कुछ बदल नहीं सकता...जीवन भर मर मर के जीना मुझे गवारा नहीं है..इसलिए मैं जा रहा हु हमेशा के लिए.. लेकिन कहाँ? ये मुझे भी पता नहीं है..
मैं जनता हूँ की आप रो रही हो.... मैं भी बहुत रोया... लेकिन हिम्मत नहीं थी की तुम्हारे सामने आ सकू... मेरी हालत तुमसे बर्दाश्त नहीं होती.... 
मुझे माफ़ कर देना..."
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मैं नहीं जनता की माँ का क्या हाल हुआ होगा.... लेकिन मेरे दिल में सिर्फ यही ख्याल था... की इक बार माँ को देख पता... इक बात पिता जी मुझे अपने सीने से लगा लेते.....
आंसू  भी कैसी अजीब चीज़ है.... जब बहते है तो इतना की थमने का नाम नहीं लेते.... 

मैं हस्पताल से निकल कर चलता रहा, कई मील जंगल में... न कोई डर था.. न कोई चिंता... चलते चलते रात हो गयी... और वहीँ इक पेड़ के नीचे सो गया.........

कैसा दिल देहला देना वाला समय था... सब कुछ खो चूका था.. घर... माँ... बाप...रिश्तेदार.... सिर्फ इक चीज़ पाने क लिए..... मौत ! और इस नरक भरी ज़िन्दगी से छुटकारा....


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कर्मश: जारी

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Tuesday, January 4, 2011

मेरे जीवन की त्रासदी


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Part-2 :जैसा की आपने पहले पढ़ा... पिताजी ने मुझ से बात करना बंद कर दी थी, बहुत जी चाहता था की मेरे पिताजी भी मेरे स्कूल में आयें और मुझे वजीफा मिलते देखें...... बुआ के पास रहता था और बुआ का पुत्र बहुत नालायक था | तुएशन रखने के बाद भी बड़ी मुस्किल से पास होता था, और मैं हमेशा कक्षा में अव्वल आता था..




पिताजी बुआ के घर पर दूरभाष किया करते थे, परन्तु मेरे से बात नहीं करते थे, मेरा दिल पसीज जाता था..घंटों गुसलखाने में रोया करता था..  पढाई में तो में बहुत अच्छा था... बिना किसी सहायता के मैंने कक्षा १० में हिमाचल प्रदेश के इम्तिहान में ९० % अंक ले कर अपने खानदान में सबसे ज्यादा अंक लेने वाला बन्न गया.  मैंने जिनती म्हणत की थी में उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकता.. बुआ और उनके पुत्र के ढेरों जुल्म सहने के बाद जब मैं पास हो गया तो मेरे पाऊँ ज़मीन पर नहीं रहे.... लगा शायद पिताजी खुश होंगे और मुझे प्यार करेंगे....


लेकिन कुछ नहीं हुआ... मेट्रिक के बाद पढना चाहता था लेकिन किस्मत को कुछ और ही गवारा था.... पिताजी की माली हालत ठीक नहीं थी इसलिए मुझे स्कूल में दिखला दिलाने की किसी ने दिलचस्पी नहीं ली...


१ जुलाई की बात है, मेरा जन्मदिन था.... घरपर माँ को दूरभाष किया तो पिताजी ने घर पर आने से मना कर दिया क्योंकि मेरा साया मेरे छोटे भाई पर पड़ता तो शायद उसे भी कुछ हो जाता.. 
बुआ के पुत्र ने मुझे  "जन्मदिन की पार्टी" देने को कहा... उस दिन में बहुत दुखी था उर जम्म कर शराब पी....  और उसी दिन मुझ  से अपने जीवन की बहुत बड़ी गलती हो गयी... मैंने शराब के नशे में अपने बुआ के पुत्र को अपने समलैंगिक होने की बात बता दी... और सछ तो ये है की सम्लान्दिक क्या होता है ये मुझे ठीक से पता नहीं था...


दो चार बार टी वि पर देखा था और यहाँ वहां से सुना था.... बस |
शायद मेरे विचलित मनन के किसी कौने में ये बात दब्ब गये होगी और नशे में निकल गयी.....




बस फिर होना क्या था.... उसने घर पर सब को बता दिया की मैं... "गांडू" हु |
पता नहीं क्या क्या अफवाहें फ़ैल गयी .. घर से पिताजी और चाचा जी आ गये... 
पिताजी ने मार मार कर अधमरा कर दिया... कई दिन तक बाएं कान से सुनाई नहीं देता था...
१० दिन कमरे में बुआ ने बंद कर के रखा और तांत्रिक के पास ले जा कर रोज मारा जाता था... २० दिन तक न ही पानी दिया गया और ना ही खाना.. हमेशा बेहोश रहता था... और रोने तक की ह्हिम्मत नहीं थी... सिर्फ माँ की शकल दिखती थी.. और वो दिन याद आते थे जब मुझे वो प्यार करती थी.... 


कई बार माँ ने फोने किया परन्तु पिताजी ने और बुआ ने बात नहीं करने दी.. बात करता भी क्या.. इक दिन गलती से मेरे कमरे का दरवाज़ा खुला रह गया... पिताजी तांत्रिक को छोड़ने के लिय बहार गये थे... 


किसी तरह से उठ कर रेंगता हुआ.. दूरभाष तक गया.. घर पर माँ का नंबर दबाया.... जैसे ही माँ ने टेलेफोन उठाया तो कुछ बोल नहीं पाया... माँ की आवाज़ सुनते ही.. बस रोता रहा... दोसरे कौने पर माँ भी खूब रो रही थी.. १० मिनट तक सिर्फ में रोता रहा.. २० दिन से खाना नहीं खाया था.. कुछ बोलने की हिम्मत नहीं थी..... सिर्फ इक ही आवाज़ निकली...."माँ मुझे मार दो" 


और फिर बेहोश हो गया |


जब होश आया तो अपने आप को फिर से कमरे में बंद पाया.... पास ही में थाली में दो केले और इक रोटी पड़ी थी... 




वो दिन आज भी याद आता है तो आँखों में आजाते हैं.... खाना सामने पड़ा था लेकिन उठा कर मुह में डालने की हिम्मत नहीं थी... सिर्फ माँ की गोद में सर रख कर सोने को दिल करता था... 


सोने को हमेशा के लिए.... लोरी सुनते हुए......इक दम शांति में.....




कर्मश जारी......click here to read futher



Sunday, October 24, 2010

उम्र कैदी

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Part 1- उम्र कैदी : अपहरण, बलात्कार और हत्या के आरोप में तो सब ही जेल जाते हैं, सजा पाते है परंतू मैं ऐसे जुर्म की सजा भुगत रहा हूँ जिसका में गुनेहगार कदापित नहीं हूँ|
4 साल की उम्र से ही घर से बहार रहा, माता पिता के प्रेम से हमेशा ही वंचित रहा | किसी तरह अपने रिश्तेदारों के साथ रह कर अपनी अभी तक की ज़िन्दगी काटी, जैसे जैसे युवावस्था में कदम रखा अपने आपको सब से अलग पाया | मित्रों के खालायात सब अपने से विपरीत पाए | सब कुछ अपने ह्रदय में समाते रखा, करता भी क्या? किसी से अपने ह्रदय की बातें भी नहीं कर सकता था, सो चुप रहा |

किन्तु 18 साल की उम्र में जैसे ही कदम रखा, मानो दुनिया मेरे लिए ख़त्म हो गयी. अपने परिजन को अपने समलैंगिक होने के विषय में बताया तो उसने घर पर सब को बता दिया. अपरोक्त विषय के बारे में अपने मित्र को बताया तो उसने भी किनारा कर लिया|
पिता जी ने घर से बेदखल कर दिया |

परिवारजनों ने दी मुझे मृत्यु से बदतर, मर मर कर जीने की सजा| इससे बेहतर होता कि मुझे किसी के क़त्ल के जुर्म में उम्र कैद कि सजा हो जाती या फंसी हो जाती| घुट घुट कर जीने से तो अच्छा होता कि इक बार में ही काम तमाम हो जाता | ताकि एक नया जीवन मिलता तो उसे अपनी इच्छा से तो जी पाता |
इक परिंदे कि तरह.... खुल कर....



मुझे अनके महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने सलाह दी, अपने विचार एवेम अनुभव मेरे साथ बांटे, उन् सब के लिए में आभार प्रकट करता हूँ | कई मित्रों ने मुझे अपने और से सहयोग प्राप्त कराने का विश्वास भी दिलाया और उन् सब मित्रों एवेम सुभ्चिन्तकों के लिए मैं अपने पूर्ण ह्रदय से आभार प्रकट करता हूँ|

कोई ऐसा दिन नहीं जाता होगा जिस दिन में अपने माता पिता को याद नहीं करता हूँ, मेरा जीवन उनके बिना अधूरा है,
मित्रो, हम मानव हैं और मानव समाज में व्याप्त सभी प्रकार के गुनाव्गुनों से हम आल्पवित हैं | अन्धकार और खोर हम सभी के जीवन में कभी न कभी आ ही धमकता है| हम जिस मानव समाज में रहते है, उस समाज में हजारों गुणों के साथ-साथ कुछ एक ऐसे अवगुण या नकारात्मक व्यव्हार भी विद्यमान हैं, जो हमें आपस में इक दुसरे का दुश्मन बना देते हैं |ऐसे में मेरा केवल इतना सा अनुरोध है कि मैं नहीं चाहता कि मेरी पहचान प्रकट होने के बाद कुछ मित्र मेरे प्रति विशेष आग्रह, अनुराग, दुराग्रह या पूर्वाग्रह से प्रभावित होकर अपने विचार रखें।

1- मेरा जीवन
मैं इक अछे मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मा था, पिताजी फोज में आफर थे| पिता जी और माता जी दोनों हिंदी लिखना पड़ना जानते थे, और परिवार में ही नहीं पूरे कुटुंब में अन्य कोई साक्षर नहीं था| मेरा एक बड़ा भाई था जिसकी बाल्य काल में मृत्यु हो गयी थी| मैं अपने माता-पिता कि दूसरी जीवित संतान हूँ और अभी अपने परिवार में सबसे बड़ा हूँ| इक छोटा भाई और दो छोटी बहनें हैं मेरी|

4 वर्ष कि आयु से ही मैं अपने माता-पिता से दूर बोअर्डिंग स्कूल में पढ़ा हूँ. स्कूल से घर , घर से स्कूल, साल भर में येही मुख्या कार्य होते थे| घर पर कुछ स्थानीय दुश्मनी के कारण हमें अपना घर बार छोड़ कर जाना पड़ा और इसी बीच में मुझे अपना बोअर्डिंग स्कूल छोड़ कर अपने बुआ और फूफा जी के घर रह पड़ा|

पिता जी कि ज़मीन चीन ले गयी और फोज से भगोड़े घोषित किये गये| पंडित को दिखाया तो पंडित जी ने कहा कि आपका बड़ा लड़का मनहूस है, पहले आपके सुपुत्र को खा गया और अब आप सब को खा जायेगा| बस वो दिन और ये दिन कि पिता जी के लिए जैसे मैं मर ही गया, कभी प्यार से दुलारना तो क्या, बात करने के लिए भी मेरे कान तरस जाते थे?
पिता जी मजदूरी किया करते थे किन्तु में अपने बुआ के घर पढाई लिखी किया करता था| महीनों और साल हो जाते थे पिता जी से बात किये हुए, दिल को बहुत दुःख होता था, घंटों गुसलखाने में छुप्प कर रोया करता था|

माँ का दिल तो माँ का दिल ही होता है, सो वो कभी कभार पिता जी से छुप्प कर बात कर लिया करती थी|
घर कि माली हालत बहुत खस्ता थी, पिता जी ने स्कूल से हटा दिया, लेकिन मेरे मास्टर जी ने निवेदन किया कि लड़का बहुत होनहार है, वजीफा दिलवा देंगे, उसी साल मुझे अंग्रेजी मध्यम स्कूल में वजीफा मिल गया और पढाई चलती रही|

"ये मनहूस है, ये तुम सब को खा जाएगा", और न जाने क्या , ना-ना प्रकार कि टिप्नियाँ सुनने को मिलती थी मुझे| पिता जी और भी दूर जाते रहे|
कई बार आत्म हत्या के बारे मैं सोचा परंतू न जाने कोनसी ताकत थी, कि मुझे अपने आप पर विश्वास था. अनेक लोगों ने मेरे पिता जी को बताया कि अपने लड़के का भूत उतारो, पूजा पाठ करवायो वर्ना ये सारे वंश को खा जायेगा|

अभी भी वो टिप्पणियाँ कानों में गूंजती हैं तो रोंगटे खड़े हो जातें हैं, और आंसूं खुद बी खुद बहने लगते हैं.
बहरहाल, जीवन किसी के लिए रुकता नहीं है.............



क्रमश: जारी.........

मैं यह अवश्य चाहता हूँ कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये ! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।


यदि आप मुझे मेल करना चाहें तो मेरा मेल आईडी निम्न है कृपया व्यक्तिगत सवाल नहीं करे

rk6ten@gmail.com