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Part-2 :जैसा की आपने पहले पढ़ा... पिताजी ने मुझ से बात करना बंद कर दी थी, बहुत जी चाहता था की मेरे पिताजी भी मेरे स्कूल में आयें और मुझे वजीफा मिलते देखें...... बुआ के पास रहता था और बुआ का पुत्र बहुत नालायक था | तुएशन रखने के बाद भी बड़ी मुस्किल से पास होता था, और मैं हमेशा कक्षा में अव्वल आता था..
पिताजी बुआ के घर पर दूरभाष किया करते थे, परन्तु मेरे से बात नहीं करते थे, मेरा दिल पसीज जाता था..घंटों गुसलखाने में रोया करता था.. पढाई में तो में बहुत अच्छा था... बिना किसी सहायता के मैंने कक्षा १० में हिमाचल प्रदेश के इम्तिहान में ९० % अंक ले कर अपने खानदान में सबसे ज्यादा अंक लेने वाला बन्न गया. मैंने जिनती म्हणत की थी में उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकता.. बुआ और उनके पुत्र के ढेरों जुल्म सहने के बाद जब मैं पास हो गया तो मेरे पाऊँ ज़मीन पर नहीं रहे.... लगा शायद पिताजी खुश होंगे और मुझे प्यार करेंगे....
लेकिन कुछ नहीं हुआ... मेट्रिक के बाद पढना चाहता था लेकिन किस्मत को कुछ और ही गवारा था.... पिताजी की माली हालत ठीक नहीं थी इसलिए मुझे स्कूल में दिखला दिलाने की किसी ने दिलचस्पी नहीं ली...
१ जुलाई की बात है, मेरा जन्मदिन था.... घरपर माँ को दूरभाष किया तो पिताजी ने घर पर आने से मना कर दिया क्योंकि मेरा साया मेरे छोटे भाई पर पड़ता तो शायद उसे भी कुछ हो जाता..
बुआ के पुत्र ने मुझे "जन्मदिन की पार्टी" देने को कहा... उस दिन में बहुत दुखी था उर जम्म कर शराब पी.... और उसी दिन मुझ से अपने जीवन की बहुत बड़ी गलती हो गयी... मैंने शराब के नशे में अपने बुआ के पुत्र को अपने समलैंगिक होने की बात बता दी... और सछ तो ये है की सम्लान्दिक क्या होता है ये मुझे ठीक से पता नहीं था...
दो चार बार टी वि पर देखा था और यहाँ वहां से सुना था.... बस |
शायद मेरे विचलित मनन के किसी कौने में ये बात दब्ब गये होगी और नशे में निकल गयी.....
बस फिर होना क्या था.... उसने घर पर सब को बता दिया की मैं... "गांडू" हु |
पता नहीं क्या क्या अफवाहें फ़ैल गयी .. घर से पिताजी और चाचा जी आ गये...
पिताजी ने मार मार कर अधमरा कर दिया... कई दिन तक बाएं कान से सुनाई नहीं देता था...
१० दिन कमरे में बुआ ने बंद कर के रखा और तांत्रिक के पास ले जा कर रोज मारा जाता था... २० दिन तक न ही पानी दिया गया और ना ही खाना.. हमेशा बेहोश रहता था... और रोने तक की ह्हिम्मत नहीं थी... सिर्फ माँ की शकल दिखती थी.. और वो दिन याद आते थे जब मुझे वो प्यार करती थी....
कई बार माँ ने फोने किया परन्तु पिताजी ने और बुआ ने बात नहीं करने दी.. बात करता भी क्या.. इक दिन गलती से मेरे कमरे का दरवाज़ा खुला रह गया... पिताजी तांत्रिक को छोड़ने के लिय बहार गये थे...
किसी तरह से उठ कर रेंगता हुआ.. दूरभाष तक गया.. घर पर माँ का नंबर दबाया.... जैसे ही माँ ने टेलेफोन उठाया तो कुछ बोल नहीं पाया... माँ की आवाज़ सुनते ही.. बस रोता रहा... दोसरे कौने पर माँ भी खूब रो रही थी.. १० मिनट तक सिर्फ में रोता रहा.. २० दिन से खाना नहीं खाया था.. कुछ बोलने की हिम्मत नहीं थी..... सिर्फ इक ही आवाज़ निकली...."माँ मुझे मार दो"
और फिर बेहोश हो गया |
जब होश आया तो अपने आप को फिर से कमरे में बंद पाया.... पास ही में थाली में दो केले और इक रोटी पड़ी थी...
वो दिन आज भी याद आता है तो आँखों में आजाते हैं.... खाना सामने पड़ा था लेकिन उठा कर मुह में डालने की हिम्मत नहीं थी... सिर्फ माँ की गोद में सर रख कर सोने को दिल करता था...
सोने को हमेशा के लिए.... लोरी सुनते हुए......इक दम शांति में.....
कर्मश जारी......click here to read futher
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